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The Madman, "Yes, three days, three centuries, three aeons. Strange they would always weigh and measure. It is always a sundial and a pair of scales."

Friday, February 20, 2009

माँ के हाथों की महक

इस जहान की कड़कती ठण्ड से छुपने के लिए बिस्तर में दुबका पडा था. छत यूँ घूरती थी मानो मेरे चहरे से घृणा हो. अपने अकेले-पन को दूर करने के लिए ख़ुद ही अपने बाल सहलाता था. बचपन में कहे शब्दों को याद करके ख्यालों पे लिख रहा था की एक तस्वीर आंखों के आगे तैरने लगी.
माँ के हाथों की महक और अपनी जिद के बीच की लड़ाई देखने लगा -


“बाहर आम के पेड़ से वादा कर आया हूँ- दूध पी के आता हूँ- इंतजार करता होगा.”


माँ ने दूध पिलाकर बिस्तर पर पटक दिया था. “माँ को अकेले डर लगता है, उसका बहादुर बच्चा पास रहेगा तभी तो सो पायेगी.”


“पर आम का पेड़ रात भर जगता रहेगा, कह आऊँ तो कबूतरों के साथ सो जाए.”


माँ ने गाल खीचते हुए कहा, “ सब की चिंता लगी रहती है!”


“मैं क्या करुँ? तुम सब ही तो मेरे बिना अकेले पड़ जाते हो. सब का ख्याल रखना पङता है.”


मेरे बाल संवारते हुए माँ ने ऐसे देखा जैसे चाँद की तस्वीर बना कर गर्व कर रही हो. “मैं तो तुझे कहीं जाने नही दूँगी. मुझे अकेले में डर लगता है.”


“तब फिर मैं क्या करुँ? मुझे तो नींद नही आ रही है, न”, कहते हुए उबासी के कारण आंखों में आंसू आ गए. “अब मुझे यूँ ही लेटे रहना पडेगा.”


माँ ने बाहों में समेट लिया. उसके हाथों की महक जाने पलकों पे क्या धर देती थी! पल भर में बोझल होके बंद हो जाती. उस महक से घिरने के बाद ना लोरी की ज़रूरत थी, न थपकी की. आम का पेड़ रात भर पुकारता रह गया।


उन हाथों की महक एक भीनी-सी याद भर बन गयी है. जाने माँ मेरे बिना कितनी अकेली होगी. डर लगता होगा तो किसको गले लगाती होगी. आराम को तरसती इन आंखों को फिर उस महक की ज़रूरत है. जाने कितने बरसों से नींद के सपने देख रही है.


अपने ठंडे बिस्तर में सिकुड़ा पडा यही सोचता रहता हूँ की माँ के हाथों की मीठी-सी महक मिल जाए तो उस में सिमट के हमेशा के लिए सो जाऊं…