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Thursday, October 14, 2010

फ़िर वही

वही पुराना गीत लिख ड़ाला आज फ़िर,
मिल गया कुछ इस में नया भी.


जाना होगा उस पार, कि राह खींच कर लिए जा रही है,
छोड़ जाऊंगा अपना एक हिस्सा यहाँ भी.


तुमने साथ निभाने का इरादा जो बनाया होता, मेरे यार,
साथ हो पाते हम आज फ़ना भी.


ऐसी ड़ोर बांधे जाना है जो कि कभी टूटे नहीं,
खिंचती रहेगी ये उम्र भर यहाँ भी, वहाँ भी.


आंसू भरी तेरी आँखों ने ये क्या मांग लिया बिछड़ते-बिछड़ते,
क्या कहूं, कि इजाज़त भी है और मना भी.


ढूंढ रहा हूँ तुझे पागलों की तरह,
और दिख रहा है तू मुझे हर जगह भी.


यादों ने साथ घर क्या कर लिया,
इकट्ठे भी हैं हम, ग़ज़ल, और तनहा भी.  

4 comments:

  1. वही पुराना गीत लिख ड़ाला आज फ़िर,
    मिल गया कुछ इस में नया भी.

    wohi purana dard hain par andaaje baya hain alag alg ... bahut khub kahenge is ghazal ko ...

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