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The Madman, "Yes, three days, three centuries, three aeons. Strange they would always weigh and measure. It is always a sundial and a pair of scales."

Wednesday, October 20, 2010

किराये के सपने

किराये के सपने उठाये फिरता रहा 
पलकों पर नहीं, कन्धों पर .
पीठ पर लादे-लादे ढ़ेरों वज़नी इरादे.
झुकी हुई पीठ और पस्त सोच,
कुढ़ता रहा जुस्तजू के बोझ तले हर रोज़.
किराये के सपने उठाये फिरता रहा.
मकान-मालिक बन बैठे ज़माने को
बाहर का रास्ता दिखाया
तो ख़ुली हवा बनकर बह आया ख़ालीपन 
और ख़ालीपन भरने आया सपनों का सैलाब,
सैलाब पिरो गया पलकों पर मीठे आँसुओं के मोती.
ये मोती बोझ नहीं, ज़ेवर हैं.
ये सपने किराये के नहीं, अपने हैं.
इस जुस्तजू मे भी तलब है,
अब इन इरादों की बात ही अलग है.

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