Friday, October 29, 2010
BUTTERFLY THOUGHTS
इस अँधेरी कोठरी के
काले धुएँ मे
खोज रहा हूँ अपनी ग़ज़ल
जहां से पैदा हुईं ये रंग-बिरंगी तितलियाँ|
ओस की बूँद पे पाँव फिसला था,
टूटने से बचा रहा हूँ
सीने मे रखा
टूटा हुआ सामान|
जब प्यासे थे पुरज़े
तो सूखी थी कलम,
बह रही है अब ये अश्कों-सी
तो पिरोने को धागा कहाँ,
बस अँधेरा है,
काला धूवां
और ये रंग-बिरंगी तितलियाँ|
चारों ओर से
खुला आसमान भाग खड़ा हुआ,
अब चार हैं दीवारें,
एक बिस्तर,
दो बंद आँखें
और है सिले होठों मे बंद
गीत मेरा|
साहिलों ने लगायी इतनी चोटें,
कब तक बहता फिरता थका-हारा,
समुंदर की आस छिपाए अपने भीतर
सिमटा पड़ा है दरिया मेरा,
किसी अँधेरी कोठरी के
काले धुएँ मे खोज रहा है रास्ता,
क्या पाया,
ये रंग-बिरंगी तितलियाँ|
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment
lemme know what you think about my stuff