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Wednesday, November 24, 2010

शहादत


देख न, 
बढ़ता जा रहा हूँ उस ओर 
जिस ओर हँसते-हँसते मरना लिखा है,
तेरी बाहों मे सिमटा 
खून मे लतपत पड़ा हूँ, 
क्या सुहावना ख़्वाब दिखा है|

तेरी नर्म मिट्टी को लाल न कर दूं,
तब तक खड़ा लड़ता रहूँ,
हर जगह तेरा परचम न हो जब तक,
बे-खौफ़, बे-परवाह
आगे बढ़ता रहूँ|

जिन ख़ुश-क़िस्मत शहीदों से
सारी उम्र जलता रहा,
अब बस मिल कर कहना है उनसे,
"तुम में मुझ मे फ़र्क़ कहाँ रहा?"
गले लगा कर कहेंगे मुझसे,
"आ, बच्चों को शहादत के गीत सुनाएं,
अपनी माँ की ख़ातिर मर-मिटने मे
क्या सुकून है,
उन्हें भी सिखाएं..." 

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