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The Madman, "Yes, three days, three centuries, three aeons. Strange they would always weigh and measure. It is always a sundial and a pair of scales."

Tuesday, September 24, 2013

COLOR CLOUDS OF ILLUSION



On this cloud of violet comfort,
Breezing my way through clamoring change
With an air of silver pride
Red hands glistening with gold,
I choose my blue eyes
To look inside, deep, where
Somewhere in the cavernous coils of memory
Underneath the carnival facade of celebrating illusions,
My truth sits humbly mourning itself,
Sometimes blue with longing
Sometimes white with despair
But always buried and hidden
Tumbled and tossed
Distorted by versions and motivation
Colored by convenience
Overshadowed by greed,
Unheard unheeded
Unaddressed.

It speaks of smells,
Seductive ones,
The kind that remind you
Of something you used to long for
A long time ago,
Something you can’t put your finger on.

Maybe of held hands
Like of lovers
But clutched so tight
Choking to white
Like a stranglehold.
No.
Must be her hair
Like black silk
Playing in the wind
Dancing like recoiling serpents
That turn you to stone with touch
But, it’s too much
Hush,
It’s done-
That rock sits petrified grey,
Inside my chest cold
Weighing against that truth,
Of which again, yes?
But why of blueness be told
When there can be a greener side?
Well, be it so.
So soft-
That look in those eyes,
Those portals of time
Fountains of timelessness
Conjurers of dimensions unknown, unplotted
Shimmering seas of chaos
Bringers of liberty through calamity
Moonlight laden desert emptiness,
Where I have sat for hours
Thinking where I was
Not understanding who,

Till there was that voice
That brought me back
Echoing across my universe
Caressing my soul
Murdering reason with velvet knives,

And making peace,
Piece by piece,
With space
Dimension by dimension
Memory by memory
Version by version,
Rebuilding the world
Replacing me on my cloud
Restoring illusions
Inside me
And all around.

Sunday, September 8, 2013

ABSOLUTE TRUTH

That which, by its presence alone, can disarm my motives and hold its own dearer to me,
Is your lingering thought.
That which, upon seeing me, turns frightfully enchanting and with tremulous bounty pours into my widening gaze,
Is your outrageous innocence.
So deep am I drunk with your everlasting spontaneity that all moments seem to flit past like eternal memories.
Hold on.
Hold my hand, here, once and say to me that you're real.
Let me have that lie from your truthful lips again.
Let me brush my sanity again against your insanely severe absence.
Let me worship you again.
Let me be that plaything again.
For I have known too long
This distance,
This reason,
This common sense,
This sense of commonness,
This perspective,
This life of creeping deaths.
Let me live
Where living is certain,
Where you are life,
Where you are not death,
Where absolute is something,
Where something is absolute.

Sunday, August 25, 2013

शौक़

मेरी डायरी के पन्ने
ऊब गए हैं 
ख़ाली पड़े पड़े.
कहते हैं,
कुछ तो बात हो 
ख़्यालों से.
मुझे आते-जाते देख 
ताकते हैं ऐसे 
जैसे मुरझा जायेंगे 
बिना स्याही की नमी के.
इन्हें बताऊँ तो कैसे,
अपने शौक़ 
बदल रहा हूँ.

LOST WITHIN




High above in my den
There’s a man.
Has his teeth and his hair
Spoilt by ages of despair.
Finds it hard to really care
About all that he loves,
A love so rare.

So you must share his pain,
But you know there’s no way.
But again,
You’ve seen him flail
His color-flutter ideas
About what he sees when he’s insane.

How he jumps from wrong to right
And makes it without a fright!
How you tie him tight!
And despite,
He digs his way out right through the night,
All the way up to the sky!

Find your heart following him
For every path is his.
He knows so many roads
That he’s lost within.
He’s seen so much
Everything seems unseen.

If ever he picks a way,
Shun, turn and run.
If there’s another way,
That’s the only one
Or everything must come undone.

Sunday, August 4, 2013

निकला है जो दिल से

बह के निकला है जो दिल से, उसे समेट के तू रखना अपने पास
बिखेर देना हवा मे जब आसमान मे तारे ना हों किसी रात

क्या पता, है ये तेरी हंसी की आहट या सोती आँखों का जागना
बरस पड़ते हैं बादल हड़बड़ा के जब याद तेरी कर देती है उदास

ये नहीं कि तेरे जाने का ग़म है या लौट आने का इंतज़ार, बस
अधूरा मेहसूस करता हूँ तो हो जाता है तेरे ना होने का एहसास

कहाँ कभी लोगों की इस भीड़ से दूर भागता हूँ मैं, ये है कि
तेरी ग़ैर-मौजूदगी मे जो तुझसे बात होती है, बस यही है अब ख़ास

जो चाहा, हमेशा खुल के तो कह ही दिया था दस-दस बार
तेरी तरफ ख़्याल खींच ले जाए, मन मे रह गयी ऐसी कोन सी बात?

Friday, July 19, 2013

यूँ जीते हो

जो पीता हूँ, तो क्यों पीते हो

जो जीता हूँ, तो यूँ जीते हो



अपनी शिक़ायतों की कैंचियों से

बात-बात पे होंठ मेरे सीते हो



नाज़ ख़ुद पे, जब क़ाबिलियत ग़ैर की

हम हारे हैं, तब तो तुम जीते हो



होगी हज़ार रंगों की शक्सियत तुम्हारी

हमारे सामने फिर भी ज़रा फ़ीके हो



रात-रात बार-बार का ये जलना क्या है

इंतज़ार करने के और भी तो तरीक़े हों


मुड़ के तुम भी तो देखो कभी इस तरफ

क्यों बार-बार ये ग़लती हम ही से हो

Tuesday, July 16, 2013

सहमी हुई सोच

घने अँधेरे में बढ़ते कालेपन की घुटन है।
इन बंद गुफ़ाओं की भूल-भुलैया में क़ैद पड़ी 
सीलती जा रही है सहमी हुई सोच। 
कुछ दफ़्न ख़्यालात नादानी में जाग पड़ते हैं कभी,
जोश में टकराते हैं तो चिंगारी-सी भी भड़क उठती है।
उस एक पल के बे-तर्तीब उजाले में साफ़ हुआ कि 
यहाँ दीवारों पे अब भी वही पुरानी तस्वीरें लटकी हैं,
नया कुछ है तो उन पे चढ़ती धूल की नई परत।
उलझी राहों में उलझी पीढ़ी
हर बढ़ता कदम पीछे खींच लेती है,
मानो हार के ड़र से 
हार मान बैठी हो।

Friday, July 12, 2013

झुके हों तारे सारे

झुके हों तारे सारे कदमो मे तुम्हारे, कम है
हमे इसका भी ग़म नहीं कि इतने ग़म हैं

ना ख़ुदी की ख़बर है, ना ख़ुशहाली का ख़्याल
इबादत उस बुत की जो मन मे हर दम है

मय के प्यालों से छलकता पाया हम ने तुम को
आसमान से बरस्ते बेशुमार तुम पे हम हैं

जिस बात को ज़ुबान से बताया नहीं जा सकता
उस की स्याही से इन पुर्ज़ो की आँखें नम हैं

वादों के पीछे इरादा सच्चा समझना भूल मेरि
कुरेदे से मिलेगा भरोसा पक्का अब भी, तेरा भरम है

दिल वफा ईमान मोहब्बत दोस्ती, दग़ाबाज़ सब
ख्वाईशें दर्द रंज ग़ज़ल साथ कदम कदम हैं

Sunday, June 16, 2013

हमे देख के मुस्कराना

आज भी नहीं भूलते हमे देख के मुस्कराना
क्या अदा है, तड़पते को और तड़पाना

हर पल साथ है साथ गुज़ारा हुआ हर पल
कल को आज फ़िर सहेज लें, कल का क्या ठिकाना


रोक लूँ आज चाँद को चढ़ने से पहले
रोक दूं चढ़ती लेहरों का आँखों मे भर जाना


बे-वजह तन्हाई मे यादों का बोझ उठाना
कब तक उस ग़म के सहारे ज़िंदगी बिताना?

रीढ़ के सहारे से ही पार लगती है
बेहद मुश्किल है उम्र दिल के सहारे पार लगाना

सुखों से भरी है सारी दुनिया, सुख का क्या है
ख़ुशी मिले कभी, तो मुझे भी दिखाना

तुम्हारे लिये नहीं है ऐसी बातें समझना
मेरे लिये नहीं है ऐसी बातें समझा पाना

Saturday, June 15, 2013

बहने दो

जो बह रहा है, उसे बहने दो
जो ठहरा है उसे रहने दो

बनना टूटना लगा रहेगा यूं ही
वक़्त का ये रंग बदलना सहने दो

सच्ची कहानी तुमने तो सुनाई नहीं
मेरा आधा सच मुझे कहने दो

MESSAGE


I’ve sent you a message.
You'll find it floating in space,
Circling around the thought
I had written on the moon.
Look up at the night sky,
Feel that cool blue,
Drink it up.
It’s flowing around in your head,
Fill your heart with it,
Let it drench your soul,
Embrace it with both arms,
Till you hear it whispering in your ear
The message I had meant to send,
When last night I was staring into the moon
And thinking about your eyes.

Monday, May 27, 2013

मेरे थे काग़ज़-कलम-शब्द, स्याही भी मेरी
ग़ज़ल, कविता, शायरी निकली तेरी बस तेरी

इस शहर से दूर आख़री आसमान तक जा मरे
फरिश्तों से भी जब बात निकली, तेरे पते पे आ ठहरी

थी कितनी ख़ुश-रँग रात वो, जिसके बाद
निकली हर सुबह यहाँ काली गहरी अंधेरी

ना छोड़ा उम्मीद का दामन, ना पत्थर-दिली का साथ
बेशर्मी की यार हद पार हुई, मेरी या तेरी

Sunday, May 19, 2013

कर दे रिहा



ख़ालीपन का एहसास ये 
बढ़ता जायेगा बेहिसाब ये 
अगर अपनी बाहों में तूने मुझे भर ना लिया 
तेरे अलविदा में छुपी फरियाद ये 
कर जाएगी बर्बाद ये 
अगर अपने चले जाने से मैंने इसे पूरा कर दिया 

अरसे से मैंने शामों को स्याही मे डुबोया है
इस बार मेरी शाम तेरे रंग मे ढ़ल जाने दे
अरसे से हवाओं मे तेरे नाम की आहट पिरोई है
इस बार मुझे तेरी ज़िद बन जाने दे

मुझे कर दे रिहा
क़ैद कर सपनों मे अपने
लिख खाली पन्नो पे नाम मेरा
मेरे होने को सफल कर दे
मुझे कर दे रिहा
कर दे
कर दे फिर से