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The Madman, "Yes, three days, three centuries, three aeons. Strange they would always weigh and measure. It is always a sundial and a pair of scales."

Wednesday, January 15, 2014

YOURS FOREVER



My dear,
I’m writing to say that I was thinking of you
Of that night,
Do you remember?
The one with the yellow moon behind thin white clouds like caressing fingers
And the sky like a silken neck showing off its favorite stone?
You softly woke and lifted your sleep heavy eyelids
And turned to me and smiled
And there they were,
Revealed,
Adding magic to moonlight,
The pathways to my home,
Your eyes.
Do you remember?
But you know there was no such night
And that I’ve been dreaming
And you also know that I love you
And I know it too.

That is all I will ever have
Softly playing in the background like a song
Like loneliness
It will always be there
Looking out my window, calling me
Pulling me away from it all
Drawing me out at night
It will be there in the walks I take
Through empty streets that breathe evenly as the city sleeps
And I will have only this
Not on my mind, not in my heart
But on my lips, silent, still
In my ears whispering suddenly, barely loud enough
In the unevenness of the steps I take
In the wind brushing against my face in gusts
In the tired blink of my eyes
Holding my hand when I stop
Gazing up at the smiling moon
It will be there looking at me, smiling goodbye
Standing in the yellow light of the streetlamp at the next turning
The one I turn back from;

But I will never know all this
And I will never know you anymore
Because you are not here
Because you will never be
Because I have no memory of the day you were
My dear, while this is for you
It is not from me
It cannot be.
Yours forever,

Saturday, January 11, 2014

अंधकार

सूरज जो दबा पड़ा था अंधी धरती के भीतर,
फूट के निकला जब, और चारों ओर चीख फैली उस की,
एक नया सवेरा हुआ.

 
इस तरह से बढ़ा वो आकाश की चोटी की तरफ
जैसे गरम रेत पे नंगे-पाँव आदमी छाँव की ओर भागता है
पंछी भी सारे डांट पड़े उसे उस की बेशर्मी पर
फूल-पत्तियों ने भी चिड़ के नाड़ झटका दी
और जब जल्द-बाज़ी मे उस से किरणें गिर पड़ी गलियों मे,
लोगों ने खिड़कियों के परदे खोले
और सोती नज़रों ने ऐसे घूरा जैसे
कुछ बोल रही थी वो नज़रें, या शायद कुछ भी नहीं


बस गंगा-घाट पे बैठा एक साधु मुस्कराया
बिचलाई लहरों के साथ सूरज का लड़कपन वाला खेल देख के.
उतर गया वो भी पानी मे
इस बचपने को नमन करने।
नमन मे उठते हाथों के सहारे

और झूकते शीश पे हाथ टेक कर
सूरज फिर बढ़ चला
और जा बैठा संसार के सर पर.
 

देखा उसने वहाँ से जितना कुछ देखने लायक था,
कितना कुछ था.
देखता रहा जब तक उस की नज़र पड़ी
उन आँखों पर जो जंगलों से झांकती थीं 

और अब बाज़ारों और सड़कों पर उतर आई थीं.
उन आँखों से हो कर जो रास्ता जाता था
सूरज शायद नहीं गुज़रा था वहाँ से.
आज उतरा
आज झांक के देखा उन आँखों मे
आज उस की लपट राख हो गयी
आज अंधेरा जीत गया
 

बाहर निकला तो उस की चाल मे सहम था
अपने पीछे झड़ती किरणे ऐसे समेटता बढ़ रहा था
जैसे संभलता घूंघट लाज समेटता है.
 

फिर वो टिक नहीं सका खुले आसमान में.
काले बादलों की ओट लगाई उस ने
और मायूस कदमों से उतरने लगा धरती की तरफ
जिस के भीतर धंस कर वो फिर से सो जाना चाहता था
उस अंधेपन को ओढ़ कर वो फिर सब भूल जाना चाहता था.

तेरा नाम है बस

कहते हैं इंसान अपनी क़िस्मत ख़ुद लिखता है
हम ने लिखी है
तेरे नाम के सिर्फ ढ़ाई अक्षर लिख के
कलम तोड़ दी थी 
वही पढ़ते रहते थे
यही करते रहते थे
उस ही को जीते थे
उस ही को तरसते थे
वक़्त की हवा ने वो स्याही सुखा दी है
ज़िन्दगी रोक दी है
एक बार लौट आ
फिर से झोंका बन के
एक बार बस
अपनी आवाज़ में
वो नाम दोहरा जा मेरे कानों में
ज़ख्म हरा कर जा
इन लकीरों को गहरा कर जा
स्याही की कालस नयी कर जा
जो लिख दिया था, किस्मत फिर वही कर जा