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The Madman, "Yes, three days, three centuries, three aeons. Strange they would always weigh and measure. It is always a sundial and a pair of scales."

Saturday, January 11, 2014

अंधकार

सूरज जो दबा पड़ा था अंधी धरती के भीतर,
फूट के निकला जब, और चारों ओर चीख फैली उस की,
एक नया सवेरा हुआ.

 
इस तरह से बढ़ा वो आकाश की चोटी की तरफ
जैसे गरम रेत पे नंगे-पाँव आदमी छाँव की ओर भागता है
पंछी भी सारे डांट पड़े उसे उस की बेशर्मी पर
फूल-पत्तियों ने भी चिड़ के नाड़ झटका दी
और जब जल्द-बाज़ी मे उस से किरणें गिर पड़ी गलियों मे,
लोगों ने खिड़कियों के परदे खोले
और सोती नज़रों ने ऐसे घूरा जैसे
कुछ बोल रही थी वो नज़रें, या शायद कुछ भी नहीं


बस गंगा-घाट पे बैठा एक साधु मुस्कराया
बिचलाई लहरों के साथ सूरज का लड़कपन वाला खेल देख के.
उतर गया वो भी पानी मे
इस बचपने को नमन करने।
नमन मे उठते हाथों के सहारे

और झूकते शीश पे हाथ टेक कर
सूरज फिर बढ़ चला
और जा बैठा संसार के सर पर.
 

देखा उसने वहाँ से जितना कुछ देखने लायक था,
कितना कुछ था.
देखता रहा जब तक उस की नज़र पड़ी
उन आँखों पर जो जंगलों से झांकती थीं 

और अब बाज़ारों और सड़कों पर उतर आई थीं.
उन आँखों से हो कर जो रास्ता जाता था
सूरज शायद नहीं गुज़रा था वहाँ से.
आज उतरा
आज झांक के देखा उन आँखों मे
आज उस की लपट राख हो गयी
आज अंधेरा जीत गया
 

बाहर निकला तो उस की चाल मे सहम था
अपने पीछे झड़ती किरणे ऐसे समेटता बढ़ रहा था
जैसे संभलता घूंघट लाज समेटता है.
 

फिर वो टिक नहीं सका खुले आसमान में.
काले बादलों की ओट लगाई उस ने
और मायूस कदमों से उतरने लगा धरती की तरफ
जिस के भीतर धंस कर वो फिर से सो जाना चाहता था
उस अंधेपन को ओढ़ कर वो फिर सब भूल जाना चाहता था.

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