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The Madman, "Yes, three days, three centuries, three aeons. Strange they would always weigh and measure. It is always a sundial and a pair of scales."

Friday, May 30, 2014

दिल कि खामोशियों से बात ना कर


काली रात की सब से गहरी परतों को
फाड़ के जो स्याही निकलती है
हम उसे सीने मे सोख लेते हैं
नसों में रोक लेते हैं
आँखों मे जगह देते हैं
बातों में गंवा देते हैं
और फिर भी जो रह जाती है
इन पन्नों पे बिछा देते हैं

_

दिल के अंधेरे कोनों में जो
अफ़साने मुंह छुपाए
औंधे पड़े रहते हैं
उनसे बात छेडने की कभी
भूल मत करना
उन के लब खुले
तो इतनी कालस फट के निकलेगी
कि पुरशोर चमकते तारों कि भी
रौशनी काली पड़ जाएगी

वो जो अफ़साने हैं
कभी उजले ठहाके थे
ठोकर खा खा के बस्तियों से
बीहड़ तक आ गिरे
फिर ऐसी अंधी धुंध छाई
कि जिन गलियों में वो जवान हुए
उनका भी रास्ता भूल गए
लड़खड़ाते पड़ते हुए पहोंचे जंगल में
धुंध से भली भूल भुलैया लगी
तो अंदर घुस गए
नौकीले झाड-पेड़ों ने जंगली जानवरों के साथ मिल कर
इतनी चोट दी
कि चमड़ी का कतरा भी न बचा
ठंडी गीली कीचड़ ने ज़ख़्मों के साथ साथ
ज़हन में भी कीड़े भर दिये
जाने कौन सा कदम था
जो जा पड़ा भूखी गुफाओं के खुले मुंह में
वहशी अंधेरे ने जब निगल लिया
पत्थर के दातों से चबाने के बाद तो हड्डीओं में भी
इन अफ़सानों के कालस भर गयी

इतनी ज़िंदगियाँ जी चुके हो
पर इन अफ़सानों ने अब तक
न दम तोड़ा है
और न मुंह खोला है
छेड़ो मत इन्हे
ये बीमार थे कभी, अब ये बीमारी हैं
इन्हे ढूंढने निकले हो, लौट जाओ
गलती से ज़ुबान खोल दी तो नसो में जहर भर देंगे
जो अफ़साने दिल के अंधेरे कोनों में छुप जाया करते हैं
उन्हे खोज के बाहर निकालने वाला इंसान नहीं रेहता,
राक्षस बन जाता है
दिल कि इन खामोशियों से बात ना कर

_


काला काला अंधेरा है सब
अंधा धुंध में भटक रहा है
गीली गुफाओं में रास्ता है
गिरता पड़ता पहोंचा है
पत्थरों कि ठंडी चमड़ी पर
गरम हथेलियाँ मसलता हुआ
कल्पनाओं को अपनी सहलाता हुआ
उतर रहा है गहराईयों में
नीच है वो, नीच बन रहा
जब कुछ ठनका
किसी बात कि याद ने चांटा मारा,
दोनों मुट्ठियाँ बंद कर के
गुस्से को जकड़ के दांतों से
पीस देता है यादों को
और दिमाग को दिल के उस कोने में
क़ैद कर देता है
जहां से उसको खुद कि भी आवाज़ नहीं आती
जैसी गुफाओं के अंदर वो रहता है
वैसी गुफाएँ उसके अंदर भी रहती हैं
भटकता रहता है अंधेरे कोने में बैठा बैठा

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