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The Madman, "Yes, three days, three centuries, three aeons. Strange they would always weigh and measure. It is always a sundial and a pair of scales."

Friday, November 13, 2015

(151)



घंटों ख़ुद पे हँसता रहता हूँ मैं
कोई पूछता है क्या सोच रहा हूँ
तो कुछ कह भी नहीं सकता हूँ

नीले उजाले की एक नदी
नसों मे बह रही है
उसमे उठते-फटते बुलबुलों से जगमग है
मस्तिष्क मे बसा मंदिर
उस मंदिर मे बैठा मैं पुजारी हूँ
पूजा मेरी हो रही है
आँखों के रास्ते आकाश मे फैलती है नीली नदी
उससे रौशन सारी कायनात हो रही है
जिस अंतरिक्ष को ख़ुद रौशन किया
जब झाँकती हैं उसमे आँखें
तो लगता है उसकी काली कोख मे
सारी रौशनी सदियों से सो रही है

पर बंद आंखों से मैंने देखा है ये
उस नदी मे बहता रौशनी का छोटा-सा क़तरा हूँ मैं
उस मे घुल के एक हो जाते हैं संसार के सारे फ़र्क
हर सतह समान हो जाती है
एक चमक रह जाती है बस

कात के उस चमक को समय के चरखे पर
अंधेरे के काले धागे बनाए हैं मैंने
जिससे बुना है सारा संसार फिर से एक बार
इस ही उधेड़-बुन मे लगा देख के
हँसता है संसार मुझ पे
और उसकी हंसी सुन के
मैं ख़ुद पे

2 comments:

  1. दुनिया से बेखबर वह रच रहा ख्वाब अनोखे , जिसमें दुनिया के सब ख्वाब हैं एक हवा के झोंके....

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